बंदरों की तरह लोग कूदें,
दिन भर बस भागमभाग में रूठें !
कभी फाइलों के ढेर में खोए,
कभी मीटिंग के भंवर में डूबें !!
काम का जंगल, सपनों का भार,
हर कोई बन बैठा बंदर लाचार !
सुबह उठें, दौड़ लगाएं,
शाम को थके, बस सो जाएं !!
कोई टीचर, कोई डॉक्टर,
कोई इंजीनियर, कोई एक्टर !
हर काम बस एक ही धुन,
खो गया मन का सूक्ष्म जुनून !!
फिर एक दिन आवाज़ आई,
भीतर से कोई पुकार लगाई !
ये क्या कर रहे हो भाई ,
रुक जाओ !!
खुद को जानो,
थोड़ा मुस्कराओ !!
आत्मा की वो कोमल पुकार,
तोड़ी जालिम भागदौड़ की दीवार !
जिनके भीतर था जोश कभी,
अब खोजने लगे खुद का सही !!
अब समझे, ये दौड़ थी झूठी,
सच तो भीतर था,
ना कहीं बाहर !!
अपने भीतर के ज्ञान को पहचान
और जान के साधक कहला !! #shabdras