मेरो मन गया कृष्ण के संग,
अब क्या रहा है बाकी।
सांस-सांस में गूंजे मोहन,
हर पल सुनूं उनकी बाँसुरी की तान प्यारी।
चलती हवा में कृष्ण बसे हैं,
झरनों में उनकी रागिनी।
पत्तों की सरसराहट बोले,
मुरलीधर की मधुर वाणी।
बच्चों की किलकारी में अब,
कृष्ण का प्रेम झलकता है।
हर ध्वनि, हर रूप में गोविंद,
मन को मोहित करता है।
सोचूं तो बस उनका नाम,
जागूं तो वही हैं ध्यान।
क्या वो भी हमें याद करते,
हम जैसे तुच्छ जीव को मान?
क्या कभी वो हमारे नाम को,
अपने अधरों से दोहराते हैं?
क्या उनके मन में प्रेम हमारा,
जैसे हमारे मन में रमता है?
हे कान्हा! तुम्हीं आधार हो,
तुम बिन जीवन सूना है।
भक्ति की इस लहर में डूबा,
मन बस तुम्हारा ही दीवाना है।