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शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

वक़्त का दरिया

वक़्त का दरिया ,
    बहता जा रहा था ,
यादों  को किनारे पर ,
    समेटता जा रहा था !

बिखेर किनारों को ,
     ढूंडू कहाँ से ,
 में तो दरिया के संग, 
बहता जा रहा था !

होती जो मर्ज़ी , 
    थाम लेता में दरिया ,
छूटे किनारे को ,
    मिल कर बताता !

खाड़ी में जाकर , 
  सबको है गिरना ,
छूटे किनारों को ,
 देखना चाहता था  ! 

वक़्त का दरिया !! आशीष चड्ढा - Chads