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शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

सूखी, भीगी, सुलगती आँखें

कुछ पंगतियाँ देश की वर्तमान स्थिति पर !! 

आज़ादी के इतने वर्ष भी, इंतज़ार करती आँखें !
    सूखी, भीगी, सुलगती आँखें !!

 इन आँखों ने, हमेशा से लड़ता हुआ देखा है !
    इस विविधता को बिखरता हुआ देखा है !!

 जो आँखों में अँगारें हों, तो वतन की सीमा पर जाकर उगलो  !
   अपनो को जलाकर, क्या मिलेगा तुम्हें  !!

जो रक़्त है भारत माँ का, तो यह लड़ाई क्यूँ !
   धर्म के नाम पर यह आतंकवाद क्यों !!


"साहित्यकारों को सम्मान वापस करते कुछ शब्द लिख रहा हूँ "
 
जो आपको मिले सम्मान,  तो करो सम्मान इनका !
   विषुब्ध हो, तो छलनी कर दो अपनी कलम से !!

जो कलम में है सच,  तो देश होगा तुम्हारा !
 सियासत में, कलम टोड़ा नही करते !
         बेवकूफों के साथ जुड़ा  नही करते !!

                                         @आशीष चड्ढा - Chads